1. देशभक्त गोखले
(Deshbhakti ki khaniya)
पाठशाला की एक कक्षा मे अध्यापक जी एक पाठ पढ़ा रहे थे। पाठ का नाम था - हीरा बड़ा या कोयला। इस पाठ मे हीरा और कोयला अपने - आपको बड़ा साबित करने मे लगे थे। हीरा कह रहा था कि वह बहुत मूल्यवान है ।इसी बीच अध्यापक जी ने बच्चो से पूछा - मान लो की किसी आदमी का हीरा खो गया है और तुम्हे वह हीरा राह में पड़ा मिला है। अब बताओ की हीरा लेकर तुम क्या करोगे।
एक बालक ने कहा- हीरा बेचकर मे नई कार खरीदूँगा।
दूसरे बालक ने कहा-उसे बेचकर में धनवान बन जाऊंगा।
तीसरे बालक ने कहा-हीरे के मालिक का पता लगाऊंगा और उसे लौटा दूंगा।
अध्यापक जी ने उससे पुछा-यदि हीरे का मालिक न मिला तो?
तीसरे बालक का नाम गोपाल था। उसने कहा-तब इसे बेच दूंगा और जो पैसे मिलेंगे, उनसे देश का सेवा करूंगा।
अध्यापक जी बालक गोपाल का उत्तर सुनकर खुश हो गए। उन्होंने गोपाल को अपने पास बुलाया। अध्यापक जी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा-तुम बड़े होकर अवश्य नाम कमाओगे।
उस बालक का पूरा नाम था-गोपाल कृष्ण गोखले। अध्यापक महोदय की बात सही साबित हुई। बड़ा होने पर गोपाल कृष्ण गोखले की गिनती भारत के महान लोगों मे होने लगी।
2. ऐसे थे लाल बहादुर
(Deshbhakti ki khaniya)
बच्चों! लाल बहादुर शास्त्री का नाम आपने अवश्य सुना होगा। वे हमारे देश के दूसरे प्रधानमंत्री थे। आइए, उनके बचपन की एक घटना के बारे में आपको बताते हैं -
यह उस समय की बात है जब लाल बहादुर छोटे थे और पाठशाला में पढ़ते थे। बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था। घर की हालत पहले से ही खराब थी। अब गुजारा चलाना और मुश्किल हो गया। लाल बहादुर पढ़ने में होशियार थे लेकिन घर की हालत ठीक न होने के कारण व पुस्तके नहीं खरीद पाते थे। एक अध्यापक रोज लाल बहादुर को पुस्तक लाने को कहते पर वे बिना पुस्तक के ही पाठशाला आ जाते। क्या करते, पुस्तक के लिए पैसे जो नहीं थे! एक दिन अध्यापक महोदय ने चेतावनी दी, "अगर तुम कल पुस्तक नहीं लाए तो तुम्हें कक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा।"
लाल बहादुर अपने एक मित्र के घर गए। उन्होंने उससे पुस्तक इस वादे के साथ ले ली कि कल सुबह पाठशाला में लौटा देंगे। फिर रात को घर के बाहर बिजली के खंभे के नीचे जा बैठे। जा लालभादुर पूरी रात उसकी नकल अपनी एक कॉपी में करते रहे। अब उनकी यह कॉपी एक बन चुकी थी।
लाल बहादुर अगले दिन पाठशाला पहुंचे। अध्यापक महोदय ने पुस्तक दिखाने को कहा। लाल बहादुर में वह कॉपी उनके सामने रख दी। अध्यापक महोदय यह देख कर दंग रह गए कि पुस्तक एक - एक शब्द हू-ब-हू उस कॉपी में लिखा था।
अध्यापक महोदय के पूछने पर लाल बहादुर बोले, "मेरी पिता नहीं है। हमारे पास इतने पैसे भी नहीं है कि मैं अपने लिए पुस्तक खरीद सकूं।"
इतना सुनते ही अध्यापक महोदय की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने लाल बहादुर को अपने पास बुलाया और उनके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा, "मुझे आशा है कि एक दिन देश तुम पर गर्व करेगा।"
अध्यापक महोदय की बात सच साबित हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री को ही प्रधानमंत्री बनाया गया।